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Akbar Taj Gwalior: ग्वालियर के इस संत ने अकबर का किया था घमंड चूर, सर का ताज रखकर यहीं से दीन ए इलाही की हुई थी शुरूआत

Akbar Taj Gwalior: ग्वालियर। इतिहास के पन्नों में अपनी एक अलग पहचान रखने वाला ग्वालियर मध्य प्रदेश का वह जिला है, जो सदैव से ही संपन्नता और आध्यात्मिक रुचिकर रहा है। ग्वालियर की धरा पर कई मानी और अभिमनियों ने...
04:44 PM Sep 25, 2024 IST | Suyash Sharma

Akbar Taj Gwalior: ग्वालियर। इतिहास के पन्नों में अपनी एक अलग पहचान रखने वाला ग्वालियर मध्य प्रदेश का वह जिला है, जो सदैव से ही संपन्नता और आध्यात्मिक रुचिकर रहा है। ग्वालियर की धरा पर कई मानी और अभिमनियों ने भी अपने अभियान को त्याग कर अपने स्वरूपों को बदला है। ग्वालियर का ऐसा ही एक ऐतिहासिक वाकया है, जो बादशाह अकबर से जुड़ा हुआ है। ग्वालियर के आध्यात्मिक और संत से प्रभावित होकर बादशाह अकबर ने यहां अपने सर का ताज भी छोड़ दिया था।

यहां रखा अकबर का ताज

मध्य प्रदेश के जिला ग्वालियर ग्वालियर का आध्यात्मिक और इतिहास से गहरा नाता रहा है। इतिहास के पन्नों में ग्वालियर का नाम सदैव उत्कृष्ट और उन्नत स्थान में रहा है। यहां कई साम्राज्य स्थापित हुए जिन्होंने ग्वालियर की व्यवस्था और प्राचीनता में चार चांद लगाए। जिनके साक्ष्य आज भी ग्वालियर में मौजूद हैं। ऐसा ही एक साक्ष्य ग्वालियर की गंगा दास की बड़ी शाला में मौजूद है, जो सीधे तौर पर बादशाह अकबर से जुड़ा हुआ है। आज भी बादशाह अकबर के सिर का ताज ग्वालियर में गंगादास की बड़ी शाला में सकुशल रखा गया है। इस ताज के ग्वालियर आने की एक रोचक कहानी बताई जाती है। साथ ही यह भी दावा किया जाता है कि दीन ए इलाही धर्म की शुरुआत भी अकबर ने ग्वालियर के एक संत से प्रभावित होकर ही की थी।

संत के चमत्कार से भयभीत हुए पहरेदार

गंगादास की बड़ी शाला के महंत पीठाधीश्वर महाराज स्वामी रामसेवक दास महाराज ने बताया कि यह बात 1400 ई. की है। जब ग्वालियर में रहवासी क्षेत्र अधिक नहीं था। चहुंओर वीरान जंगल था। किले से कुछ दूरी पर शाम के समय एक रोशनी पहरेदारों को नजर आती थी। जब सुबह के समय पहरेदार वहां आते तो वहां कुछ भी नजर नहीं आता था। धीरे-धीरे किस्सा बढ़ता गया। अब उसके बाद आवाज भी आना शुरू हो गई, मानो कोई पूजा पाठ कर रहा हो लेकिन जब मौके पर पहरेदार पहुंचते तो उन्हें कुछ भी नजर नहीं आता। पीठाधीश्वर महाराज स्वामी रामसेवक दास जी महाराज का कहना है कि यह चमत्कार महाराज गंगादास का था।

जब दौड़े चले आए अकबर

संत अपने सूक्ष्म शरीर के जरिए साधना किया करते थे लेकिन उनके इस स्वरूप से डरकर पहरेदारों ने इसकी सूचना दिल्ली में बैठे बादशाह अकबर को दी। बादशाह अकबर भी इस विचित्र घटना को देखने के लिए स्वयं ग्वालियर चले आए और आकर उक्त स्थान का जायजा लेने पहुंचे। हालांकि, वहां कुछ भी मौजूद नहीं था। कुछ देर बाद जब बादशाह महल वापस पहुंचे तो शाम को हुई घटना ने उन्हे भी अचरज में डाल दिया। महाराज के पूजा पाठ के समय फिर से आवाजों को सुनकर बादशाह अकबर एक बार फिर लौटे तो देखा कि टीले पर एक दिव्य ज्योति नजर आ रही है।

पास जाकर देखा तो वहां पर एक संत आराधना कर रहे थे जो कि बादशाह को देखकर खड़े नहीं हुए। अकबर ने अभिमान में आकर आराधना कर रहे संत को देखकर बड़ा अचरज किया और कहा कि क्या यह सब आप ही कर रहे हैं? तो महाराज को भी बड़ा अचंभा हुआ कि ईश्वर की आराधना कर रहे व्यक्ति के आराधना में खलल डालकर यह व्यक्ति सम्राट है तो क्या हुआ, ईश्वर की आराधना में खलल डालने का अधिकार तो किसी को नहीं है।

अकबर का अभिमान किया चूर

इस तरह के बाद संवाद के बाद जब अकबर ने अभिमान भरी कुछ बातें कहीं तो महाराज ने अकबर का अभियान तोड़ने के लिए स्वयं को इतना ऊंचा कर दिया कि वह हाथी से भी ऊपर नजर आने लगे। यह देखते हुए अकबर ने जब ऊपर सिर किया तो उनके सिर का ताज ही नीचे गिर गया। इस दृश्य के बाद अकबर का अभिमान चूर-चूर हो गया और वह संत के आगे हाथ जोड़कर नतमस्तक खड़े हो गए। संत महाराज से बोले कि आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिए लेकिन महाराज ने कहा कि आप अभी सिर्फ एक ही बंधन में बंधे हुए हैं। जब सभी बंधनों से मुक्त हो जाएंगे तब मैं आपको दीक्षा दूंगा।

महाराज की बातों को अकबर भी समझ गए और उन्होंने सभी धर्म का सम्मान ही नहीं बल्कि उन्हें मानना भी शुरू कर दिया। इसी तरह ग्वालियर से ही दीन ए इलाही धर्म की शुरुआत हुई, जो बाद में वृहद रूप में समाज के सामने आया। लेकिन जो सर का ताज अकबर का गिर गया था, उन्होंने महाराज को यह कहकर समर्पित कर दिया कि यह ताज नहीं मेरा अभिमान था, जो आज चूर-चूर हो चुका है। इसे यहीं रहना चाहिए ताकि लोगों को भी संदेश मिल सके कि अभिमान नहीं करना चाहिए। पीठाधीश्वर महाराज रामसेवक दास जी का कहना है कि यह ताज आज भी गंगादास की शाला में सुरक्षित रखा हुआ है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। अकबर से मुलाकात को सचित्र भी गंगादास की शाला में समझाया गया है।

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