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MP High Court Decision: नाबालिग बहन से दुष्कर्म और हत्या के मामले में जिला कोर्ट की फांसी की सजा को हाईकोर्ट ने पलटा, एक आरोपी दोषमुक्त, दूसरे को सुनाई 25 साल की सजा

MP High Court Decision: जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर प्रिंसिपल पीठ ने नाबालिग बहन के साथ गैंगरेप और गला काटकर की गई हत्या के आरोपी दो भाईयों में एक आरोपी को दोष मुक्त कर दिया है, जबकि दूसरे आरोपी की...
02:55 PM Oct 19, 2024 IST | Dr. Surendra Kumar Kushwaha

MP High Court Decision: जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर प्रिंसिपल पीठ ने नाबालिग बहन के साथ गैंगरेप और गला काटकर की गई हत्या के आरोपी दो भाईयों में एक आरोपी को दोष मुक्त कर दिया है, जबकि दूसरे आरोपी की फांसी की सजा को पलटते हुये 25 साल की सजा से दंड़ित किया है। दरअसल सागर जिला कोर्ट ने प्रकरण को दुलर्भतम केस मानते हुये आरोपियों को कठोरतम सजा के तहत फांसी की सजा सुनाई थी जबकि हाईकोर्ट ने प्रकरण को दुलर्भतम प्रकरण की बजाय आरोपियों को सुधरने का मौका मिलने की याचिकाकर्ता की अपील को अहम मानते हुये फांसी की सजा को पलटते हुये 25 साल की सजा सुनाई है।

रेप और दुष्कर्म के लिए जिला कोर्ट ने दी थी फांसी की सजा

सागर जिला एवं सत्र न्यायालय के बहुचर्चित नाबालिग बहन से बलात्कार और गला काटकर 13 मार्च 2019 को की गई हत्या के मामले में आरोपी रामप्रसाद अहिरवार और बंसीलाल अहिरवार को फांसी की सजा सुनाई थी। मृतका के पिता को 14 मार्च को बेरखेड़ी मौजाहार में बेटी की सिर कटी मिली थी, इस पर बंडा पुलिस ने पतासाजी के दौरान दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया था। मृतका नाबालिग आरोपी बंसीलाल अहिरवार की भतीजी एवं रामप्रसाद अहिरवार की रिश्ते में बहन थी। बंडा सागर पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ चालान पेश करने के साथ पुलिस ने तमाम जरूरी साक्ष्य, सबूत और गवाहों की कोर्ट पर समय से पेशी कराई, जिस पर जिला कोर्ट ने दुर्लभतम केस मानते हुये आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी।

दोषियों के वकील ने हाईकोर्ट में दी यह दलील

सागर जिला एवं सत्र न्यायालय के फैसले को आरोपियों की ओर से मध्यप्रदेश हाईकोर्ट प्रिंसिपल पीठ में चुनौती दी। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल एवं जस्टिस देव नारायण मिश्रा की डबल बेंच (MP High Court Decision) ने सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट मनीष दत्त ने पैरवी करते हुए उनका पक्ष रखा। वकील ने आरोपियों की पिछड़ी और कमजोर आर्थिक स्थिति के साथ-साथ अल्पशिक्षित तबके एवं कम उम्र में प्रायश्चित कर जीवन में सुधार की संभावना की दलील दी, जिसे हाईकोर्ट ने स्वीकार किया।

डिसीजन सुनाते हुए हाई कोर्ट ने कही यह बात

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि यह मामला दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में नहीं आता है, जहां अपीलकर्ता को केवल मृत्युदंड ही दिया जाना उचित है। लिहाजा हाईकोर्ट ने आरोपी बंशीलाल के जुर्म कबूलने पर दोषमुक्त कर दिया, जबकि रामप्रसाद की फांसी की सजा को पलटते हुये 25 साल की सजा में बदल दिया। वहीं पुलिस द्वारा इस मामले में मृतका की चाची सुशीला अहिरवार को भी आरोपी बनाया गया, जिसे हाईकोर्ट (MP High Court Decision) ने बरी कर दिया। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकारी वकील मृतका की वास्तविक आयु सिद्ध करने में भी विफल रहा है।

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